शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

मैथिल वैलेनटाईन डे।(प्रेमक पाबनि)

आई भोरे भोर मिसराईन  मिसर जी के कहलखिन,  हेयौ  सुनई छी,आई हम्मर सबहक पाबनि अछि। मिसर ज़ी अकचका क पुछलखिन ,से की?  मिसराईन व्याख्या केलखिन , आई वेलेटाइन डे छैक ।आई संपूर्ण दुनिया प्रेमक पाबनि मना रहल अछि। अहि पाबनिक मंत्र अछि  'आई लाभ यू 'आ बिध बिधान भेल ,रंग बिरंगक गिफ्ट, घुमेनाई,फिरनाई आ पूर्णाहुति होटल गेला पर होई छैक।
मिसराईन उपराग  दईत बजलखिन यौ आहां त  कहियो हमरा 'आई लभ यू नहि कहलियै।
मिसर ज़ी क माथा घूमि गेलनि, मोने मोन सोचलनि जौं अहि फेर में पड़ब त बड़का चक्कर में फंसनाई निश्चित ।
कहलखिन हे यै ,अपना सबहक ई सब मनेबाक उमरि आब नहि अछि, जाक ऐना में अपन मुंह देखू आ हमर विशाल धोधि।  अरे ई  सब त अंगरेजबा सबहक करस्तानी छैक  अपन दोकानदारी चलेबाक चलाकी  ।नबका छौड़ा  छौड़ी बताह भेल रहैत  अछि।  सबटा बात मुहे सं कहल ताकि?
किछु बातक अनुभवक सेहो  कैल जाई छैक। कहैत मिसर जी  बजार दिस विदा  भेला,  मिसराईन मूल लटकौने भानस भातक ओरियान में लागि गेली।
थोड़बे काल में मिसर जी अपन कनियाँ के शोर पाड़लखिन कहलखिन हे यै एम्हर आऊ ने ,देखू केहन टटका माछ अनलहूं अछि,।
आंहा  हाथक माछ खेला बहुत दिन भय गेल छल।फटा फट रांन्हि लिअ,
 दूनूगोटे संंगे खैब ।
माछ प्रेमी मिसराईन माछ रंधवाक ओरियान  में मगन भ गेली।मिसर मिसराईन क (प्रेमक पाबनि मानि रहल अछि।)
 यैह  अछि अपना सबहक वैलेनटाईन डे।

सोमवार, 18 नवंबर 2019

बरुआ मांगे बाईक

बरुआ मांगे बाईक

उपनैन खूब धूम धाम सं मनाबी,एहन सपना  लोग देखईत अछि, सेहो लोक जे गाम में रहैत त नहि छथि मुदा जे एखनो अपन जन्मस्थान सं जुड़ल   छथि आ ईच्छा छनि जे हुनकर बालो बच्चा गाम सं जुड़ल रहनि।मुदा आई काल्हिक बच्चा ने जनऊअक  महत्व नहि बुझई छैक आ ने टीकक आवश्यकता ।माथ पर  टीक,आ कान पर जनेऊ लपेट क लधुशंका केनाई , ई आबक समय में  बहुत कम देखाईत अछि, विशेष क युवा जन मे ,हुनका    लाज होई छनि। अपन संस्कृति क प्रति हीन भावना ,ई मिथिलाक लेल दुर्भाग्यपूर्ण छैक।ओ सब अतेक ताम झामक कोनो प्रयोजन नहि बुझई छथि। तैं ओ कहैत अछि,
इससे अच्छा मुझे एक बाईक दिलवा देते।
बच्चा के ई कहनाई  हमरे सबके ऐना देखेनाई अछि। शहरी एकल परिवार के बच्चा,जकर दुनिया माय बाप,भाय बहिन तक  सीमित भेल जा रहल  अछि, ओ सब कखनो काल हफ्ता दस दिनक लेल गाम गेले सं की   ओ  बाबा बाबी,च्चा चाची के गेस्ट बुझईत अछि।ऐना में ओकरा अपन गाम, परिवार सं लगाव कियैक हेतई ?
एखुनका समय संक्रमणकाल अछि |तेजी स बदलैत विचार धारा ,रहन –सहन ,खान –पीन,स्थान- परिवेष |लोग दुविधा में पड़ल अछि |करी त की करी ?एकदम्मे आधुनिक बनल जाय ,या सनातन व्यवस्था के पकड़ने रहि ?अप्पन परम्परा के छोड़नाई उचित नहि छैक मुदा ओहि मे जौं किछु संशोधन केला सं जौं एकर मूल स्वरूप अथवा उद्देश्य मे कनेको अंतर नहि बुझाइत होइ त किछु फेर बदल हेबाक चाहि, विशेषतः समयाभाव क कारण।ओना त,बंसकट्टी सं, शुरुआत एक  मासपहिने कैल जाइ छई,मुदा अगर सबटा विध व्यवहार एक सप्ताह तक समटा जाई त,नोकरीहारा लोग के सुविधा होयतैक। मैथिल ब्राह्मण सब अपन गाम छोड़ि बाबाधाम या हरिद्वार में उपनैन करय लागल छथि। कारण समयाभाव त छहिए दोसर दिनों-दिन  यज्ञोपवीत संस्कार,आब अपन वैभव प्रदर्शन -आयोजन भेल जा रहल अछि।एखन परिस्थिति ई भेल जा रहल अछि जे सामर्थ्य नहियो रहला पर देखा देखी में आदमी खर्चक चक्की में पिसा जाईयै। तैं ओ एहन परिस्थिति सं बचबा क लेल बाबाधाम क शरण में जाय लेल मजबूर अछि।
कोनो संस्कृति, भाषा, व्यवस्था,तखने दीर्धकालीन होईत छई जखन ओ  समयाकूल परिवर्तन के स्वीकार करैत अछि। अपन गाम क आयोजन सन शोभा-सुंदर,आनठाम कतय?

जीवन संध्या क धुरंधर

 यौ,जीवन संध्या क धुरंधर जन,
की  करैत छी ?
समाज बिगड़ल जा रहल अछि ।कोनो समाजक मूल तत्व, समाज सं समाजिकता समाप्त भेल जा रहल अछि। लोग समाज में रहितो एकाकी अछि।ककरो सं  कोनो मतलब नहि । पाबनि तिहारो  में लोग घरे में रहैत अछि ।सब अपन  अपऩ खोल में बंद रहैत अछि।   ,किनको धन क अहंकार, बल क अहंकार, ज्ञान क अहंकार। मुदा जीवन में धन -धान्य के अलावा बहुत किछु छईक।  अपन मोनक द्वार खोलू , आगां होउ, अप्पन खोल सं बहराऊ ने पहिने लोग समाजिक छल ,कारण मरला क बाद चारि गोट कनहा देनहार क उम्मीद करैत छल।मुदा 'मार बाढ़ैन ई अपार्टमेंट, संस्कृति आ एकल परिवार  प्रथा  के' ।आब त पड़ोसी क घर में किछु घटना घटैत छैक‌, ऐम्बुलेंस आबि क डेड बौडी ल क  मॉर्गन में , डाहि दई छई, कियो बुझलक कियो नई बुझलक।

सुधि जन कनेक विचार करई जाउ।
हम समाज स की चाहैत छी?
हमरा  समाज सं की भेटल?
हमरा समाज सं की दिक्कत अछि? अंत में,
 हम समाज के की देलियई ?,‌‌‌‌
 ओना ,हम सड़क के कात में नहि ,जंगल में नहि ,समाजक बीच रहय चाहैत छी। कारण समाज में हम सुरक्षित रहैत छी।समाजक लोग सुख दुःख में संग रहता से उम्मीद करैत छी। समाज, लोग के अनुशासित करैत अछि ,आहां अनर्गल किछु नहि क सकैत छी‌,कियो रोकनहार ,टोकनहार भेटिए जायत ।
जौं कोनो समस्या होईत छल ,पहिने व्यस्तता छल ,आब आहां फुरसत में छी,त समस्या क निदान करू ने ,
आगां धिया पुता के वैह परेशानी नहि होईनि।
महानुभाव आहां स़बगोटा अपन अपन क्षेत्र के धुरंधर रहल छी। अहीं सं  ऐहन उम्मीद कियै, कोनो युवा सं कियैक ने ?कारण आजुक युवा अपन जीविकोपार्जन मे हरान अछि।ने ओ समय पर खाई यै ने सुतैया,ओकरा सं कोनो अतिरिक्त काजक उम्मीद नहिए करी।आहां लोकनि कोनो युवा सं अधिक उर्जावान छी, रिटायरमेंट के बाद फुर्सत में छी।'ई लुत्ती लगौना मोबाइल ,ने अपने चैन सं रहत न ककरो रहय देत । त्यागू अहि जहरबंद  के ,अपन उर्जा, ज्ञान, अनुभव के सार्थक दिशा देलजाउ। समाज सदैव आहां के ऋणी रहत।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

विश्विद्यालय में व्याप्त अनाचार|

भागलपुर शिक्षा के लिए जाना जाता था | इसका प्रमाण विक्रमशिला के खंडहरों  को देख कर समझा  जा सकता है |लेकिन इधर कुछ सालों  से विश्व विद्यालय इस कदर शिक्षा माफिया के चंगुल में  फंस गया है की  शिक्षा से सम्बन्धित जितने भी कुकर्म होते हैं सारे किये जा रहे हैं |
भागलपुर का मारवाड़ी कॉलेज कइ  मायने में अभी भी अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने में सफल रहा है |
लेकिन इधर कई सालों से जो डर्टी पोलटिक्स कॉलेज में देखा जा रहा है वह  निंदनीय है| एक तरफ कोलेज की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही  है दूसरी तरफ कोलेज के प्रभारी प्राचार्य को जिस तरीके से अनर्गल आरोप लगा कर ,जाँच कमिटी बना कर उन्हें कार्य मुक्त करवाने की गंदी चाल  चली गयी है वह  काफी अपमानजनक है | उनकी छवि एक अच्छे शिक्षक के रूप में रही है| प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी v ईमानदारी से निभा रहे थे ,इसे में उन पर वित्तीय अनियमितता एवं दुर्व्यवहार का झूठा आरोप लगा कर पद से हटाना मानसिक प्रताड़ना है |सुबह अख़बार में देख कर आश्चर्य हुआ |जिन्दगी भर कमाई प्रतिष्ठा गवां बैठे \| यश पाने में वर्षों लगते है अपयश जंगल की आग समान फैलने में देर नही  लगती जब जाँच कमिटी अपनी रिपोर्ट देगी जब देगी तब देगी ,तब तक वो किस किस को अपने इमानदार होने का प्रमाण देते फिरेंगे |आपोप इतने गम्भीर भी नहि हैं श्रीमान कुलपति इसे अपने स्तर पर निपटा सकते थे |रिटायरमेंट  से पहले उनके कैरियर पर एक दाग  लग गया |






रविवार, 19 फ़रवरी 2017

हौले हौले

हम बदल रहे हैं .लेकिन बड़े प्यार से आहिस्ता –आहिस्ता ,इतना की हमे खुद पता नही हो रहा है .मजे की बात ये है की इस परिवर्तन के लिए न कोई आन्दोलन हुआ न तो कोई झड़पें हुई पर हम बदल गये .आप लाख कहें ,कोई हो नहो की आप तो अपनी परम्परा को सम्हालने वाले अकेले इन्सान है पर जब मै बिदुवार इसके लक्ष्ण गिनाउंगी तो कही न कहीं आपकी सुई अटक जाएगी ,और एक चुभन जरुर महसूस होगी हमारी भाषा ,पहनावा ,खाना –पीना ,रीती-रिवाज ,और विचारों ने तो ऐसी छलांग लगाई है की पुरानी सोच चारों खाने चित्त हो गया है . शायद ये ग्लोबल संस्कृति की शुरुआत हो . 1. सबसे पहले अपनी बोली हिदी को लें.अंग्रेजी शब्दों से भरी हुई जिसमे क्षेत्रीय भाषा का तड़का लगा कर बोली जाने लगी है. 2. छोले भटूरे ,इडली डोसा ,चाउमीन ,ढोकला ,पावभाजी ,दही बड़ा ,पुरे देश में मिलती है ,और चाव से खाई जाती है . 3. सलवार सूट पर अब पंजाबियों का एकाधिकार नही रहा .सबों ने इसे स्वीकार कर लिया है लडकियों ने ही नही आंटियों को भी भा गया है . 4. कुंवारी लडकियों का नौकरी करना वो भी अपने घरों से दूर अकेली रह कर ,कल्पना से परे था,बल्कि कम औकात की बात होती थी .अब हर कोई नौकरिवाली पत्नी चाहता है . 5. लाडले बेटे का घरेलू कामो में अपनी पत्नी की हेल्प करने पर खून का घूंट पी कर रहने वाली माएं ,अब बेटे को कोओपरेटिव नेचर वाली सीख दे रही है 6. लडकों को भी अब नैपी बदलने ,पौटी साफ करने से कोई परहेज नही है . 7. परिवार के साथ दूर दर्शन पर चित्रहार या सिनेमा देखते वक्त एडल्ट सीन के समय लोग इधर उधर ताकने लगते थे .अब तो सोशल मिडिया पर घर की बहु बेटियां आधुनिक कपड़ों में सेल्फी पोस्ट करने में हिचक नही करती उधर ससुर जी like करने लगे हैं . 8. अपने शहर में होटल में खाना फिजूलखर्ची माना जाता था अब उसे रईसी माना जाने लगा है. 9. सबसे अछ्छी बात लडके लडकियों का एक समान पालन पोषण होने लगा है . 10. सबसे दुखद है ,खेती को छोड़ना .पहले नौकरी को निकृष्ट और खेती को उत्तम कार्य माना जाता था अब ठीक उल्टा नौकरी करने वाले अपने खेत बेच कर नौकरी वाले स्थान में भाग रहे हैं अपनी पहचान खो कर एक शहरी चेहरा बन कर रहने को अभिशप्त मनुष्य

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

आजुक गाम

बहुत दिनक बाद ,किछु दिन गाम में बितयबाक अवसर भेटल .एखुनका गामक स्थिति आ पहुलका गामक स्थिति में बहुत अंतर बुझायल., गाम घर आब ओ गाम घर नहि रहि गेल अछि.हम बहुत पुरान दिनक गप्प नहि  कहि रहल छी. आई सं बीसे-पचीस बरख पहिने तक मिथिलांचलक सामाजिक परिवेश ,रहन –सहन , बात –विचार, आन कोनों समाज सं सुंदर आ परिष्कृत, सुसंस्कृत छल . हमर स्मृति में एखनो अप्पन गामक ओ साझी अंगना क दृश्य ओहिना अंकित अछि..चोकोर आकार वाला आंगन .
  अहि में कोनों शकक गुंजाईश नहि जे आब मिथिलांचल  सम्पन्न भेल जा रहल अछि .अधिकतर मकान पक्का थिक,छत पर एंटीना ,दलानक आगां मोटर साईकिल  अथवा चरिपहिया ,लोकक सम्पनता पहिरब –ओढब,में मकान –दूकान देखि क बुझल जा सकैत अछि .भले ही ई सम्पन्नता क्षेत्र सं बाहर जा क कमा क प्राप्त कैल गेल होई ..कियैक त स्वतंत्रता के बाद ,सब सरकार द्वारा एहि क्षेत्र क अवहेलना कैल गेल अछि ..नहि कोनों उद्योग के स्थापना कैल गेल आ ने व्यापार के प्रोत्साहन देल गेल . तखन ई तथ्य सत्य थिक जे प्रतिभा  कोनों ने कोनों बाटे अपन रास्ता निकालिए लईते अछि .तैं देखल जा रहल अछि जे मिथिला वासी दोसर  –दोसर क्षेत्र में जा क अपन प्रतिभा के झंडा गाड़ी रहल छथि ,.आ ओहि उपार्जित धन सं अपन गाम घर परिवारक जीवन स्तर बढा रहल छथि .
               उपरी तौर पर ई देखि मोन प्रसन्न भ गेल ,लेकिन जखन अहि सम्पनता क तह में जाऊ त बुझा पड्त जे ,जेना –जेना लोक सम्पन्न भेल जाईया ,तेना –तेना ओकर समाजिकता समाप्त भेल जा रहल थिक .फलना बाबु के बेटा अमेरिका में नौकरी करैत छनि ओ बोरिय में नोट कसि क अपन माँ –बाप के पठबैत छनि .ओ गुमाने टर्र रहैत छथि .आब ओ ककरो दलन पर कियैक जेता ?अप्पन पैघ मकान में ग्रील्क अंदर एसगर ,लोकक प्रतीक्षा में बैसल रहैत छथि मुदा कियो हुनका दलान पर नहि जाईत छनि कारण चिलना बाबुक बेटा सेहो इंग्लैण्ड सं पाई पठबैत छनि जे मिथिलांचल अपन समाजिकता क लेल जानल जाईत छल,धीरे –धीरे समाप्त भेल जा रहल अछि.बडका-बडका ,मकान ठोकि ओकरा दुनू दिस ग्रिल में ताला बंद क अपना आप के ओहि में कैद क नेने अछि, आब कियो ककरो अंगना नहि जाईत छैक .नोते-हकारे भेंट भेल त भेल .

         ओम्हर युवा वर्ग के उर्जा व्यर्थक काज में नाश भेल जा रहल अछि दियाद –बादक ,राजनीति में ओझरायल युवा वर्ग चाहय त बहुत  किछु कय सकैत अछि ,आवश्यकता छैक हुनका अवसर प्रदान करय के . . .                  .

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

सार्थक जितिया


जितियाक पारण क दिन छल,पूजा-पाठ,नैवेद्य लगा क उठले छलहुं ,मोन उदास छल ,आई कतेको बरख स एही पाबनि दिन कोनों बच्चा लग में नहि रहैत अछि   .मोन  बड क्ल्पइत अछि मुदा उपाय की ? मार बाढ़इन, अहि नोकरी के, नेना सब पबनियो तिहर में नहि अबैत अछि .तखने सूरज धड़फड़ाइत पहुँचल,पुछलक ,
मलकाइन आहाँ के पूजा भ गेल? पूड़ी छ्नबाक लै कडाही चढाऊ की ? सूरज तेरह –चौदह बरखक बालक ,ओ घरक काज में हमर सहायताक लेल रहैत अछि .ओकर बाप रिक्शा चालक छैक .हमर डेराक लगे में ओ सब रहैत छल तेँ प्रायह ओकरे रिक्सा सं बजार जाईत छलहुं .एक दिन अनायासे पुछि देलियै हौ, रिक्शावला कोनों छोट लड़का तोरा ध्यान में छौ जे घरक काज में हमर हाथ बटाबै,और हौं ओकर पढाई लिखाई के जिम्मा हम्मर .हमर मोन बेसी काल खराबे रहैत अछि,कनी तकियह्क. एकर दुइये –चारि दिनक बाद यैह सूरज के संग नेने एकर बाप रिक्शावला पहुँचल .ई बालक इस्कुल्क ड्रेस पहिरने छल .देखिते हम बजलीयई
ई त इस्कूल जायवला बच्चा छैक ,हम एकर भविष्य नहि खराब करबैक अओर कोनों निर्धन हो ,जकरा पढ़बाक क सुविधा नहि हुए तकरा अनितहक ने .तखन ओ कहलक जे ई ,बड्ड बदमाश छैक हम त रिक्शा ल क कमाबय लै चलि जाईत छी पाछू काल ई इस्कूल सं भागि जाईत आछि,अपन माय के कोनों मोजर नहि दईत छैक ,जों आहाँ एकरा अपना लग राखि लेबई त एक्कर जीवन बनि जेतईक .अस्तु! ताहि दिन सं सूरज हमरा सबहक सेवा में लागल अछि .संतानक हर कर्तव्य के पूरा करैत .कखनो काल त ताहू सं बेसी .हमर आँखि डबडबा गेल .हम नैवेद्य्क सराई ओकरा हाथ क दऐ देलियै आ कहलियै पहिने ई प्रसाद खा लै तखन पूड़ी छ्नीयहक .बालक प्रसन्न मोन सं प्रसाद खाय लै चलि गेल .
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